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✉️ सीएम हेल्पलाइन 181 — जनता की आवाज़ या कमाई का जरिया?

—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह—

✉️ सीएम हेल्पलाइन 181 — जनता की आवाज़ या कमाई का जरिया?

मध्य प्रदेश सरकार की “सीएम हेल्पलाइन 181” योजना का उद्देश्य जनता को राहत पहुँचाना था — ताकि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह गाँव में हो या शहर में, अपनी समस्या शासन तक सीधे पहुँचा सके और उसका समय पर समाधान हो सके।

पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में शुरू की गई यह योजना जनता की सच्ची आवाज़ बन चुकी थी। हजारों शिकायतें दर्ज होती थीं, और शासन स्तर पर उनका संज्ञान लेकर समाधान भी किया जाता था।

लेकिन अब, इस व्यवस्था की साख और पवित्रता दोनों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

🔹 आज की स्थिति — “जनसुनवाई” से “कमाई” तक

आज प्रदेश के कई जिलों — दमोह, सागर, छतरपुर, रीवा, सतना, कटनी, शहडोल आदि — में यह बात आम हो गई है कि 181 पर की गई शिकायतें न केवल लंबित रहती हैं बल्कि कई बार “लेन-देन” का जरिया बन जाती हैं।

अक्सर शिकायतकर्ताओं ने पैसे की मांग की और बिचौलियों के माध्यम से सौदेबाज़ी की शिकायतें सामने आती हैं।

कई गरीब और आदिवासी परिवार महीनों तक दर-दर भटकते हैं, लेकिन समाधान के नाम पर सिर्फ “फाइल बंद” की सूचना मिलती है।

यह प्रवृत्ति न केवल जनता के विश्वास को तोड़ती है बल्कि शासन की जनसुनवाई व्यवस्था पर गहरी चोट करती है।

वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में अधिकारियों को यह निर्देश दिया है कि जो लोग बार-बार “आदतन शिकायतकर्ता” के रूप में झूठी शिकायतें करते हैं, उनकी सूची बनाकर कार्रवाई की जाए।

यह कदम निश्चित रूप से आवश्यक है ताकि तंत्र पर बेवजह बोझ न बढ़े और झूठी शिकायतों से प्रणाली का दुरुपयोग न हो।

परंतु जनता का प्रश्न भी उतना ही वाजिब है —

> 👉 अगर कोई सच्चा व्यक्ति, गरीब या पीड़ित नागरिक, बार-बार न्याय की गुहार लगाए, तो क्या उसे भी “आदतन शिकायतकर्ता” कहकर खारिज कर दिया जाएगा?

👉 और यदि शिकायत सही पाई जाती है, तो क्या संबंधित लापरवाह या भ्रष्ट अधिकारी पर भी उतनी ही सख्ती से कार्रवाई होगी?

अक्सर देखा गया है कि 181 पर दर्ज शिकायतों का निपटान सिर्फ औपचारिकता के रूप में किया जाता है।

कई बार बिना शिकायतकर्ता से संपर्क किए ही शिकायत “समाधान हो गया” लिखकर बंद कर दी जाती है।

कुछ मामलों में तो अधिकारी और कर्मचारी मिलकर फर्जी “समाधान रिपोर्ट” बनाकर फाइल बंद कर देते हैं।

कुछ सूत्रों का कहना है कि कुछ बिचौलिए या शिकायतकर्ता खुद ही अलग-अलग नामों से शिकायतें दर्ज करवाते हैं और फिर “ले देकर” उन्हें बंद भी करवा देते हैं।

यह न केवल भ्रष्टाचार है बल्कि शासन की मंशा को ठेस पहुँचाने वाला अपराध है

जब कोई गरीब, मजदूर, किसान, आदिवासी या बुजुर्ग अपनी समस्या लेकर शासन के पास जाता है, तो उसकी आखिरी उम्मीद होती है — “सीएम हेल्पलाइन 181”।

लेकिन जब वही व्यक्ति महीनों तक शिकायत दर्ज कराता रहे, और हर बार उसे सिर्फ “समाधान हो गया” का संदेश मिले, जबकि असल में कोई कार्यवाही न हुई हो — तो उसका शासन से विश्वास खत्म हो जाता है।

ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जैसे:…………?

संबल योजना, प्रधानमंत्री आवास, पेंशन, मनरेगा मजदूरी, और भूमि विवाद जैसे मामलों में शिकायतें दर्ज होने के बावजूद कोई वास्तविक राहत नहीं मिलती।

कई ग्राम पंचायतों में सचिव या सरपंच द्वारा शिकायतकर्ता ने “लेन-देन” की माँग कर शिकायत निपटाने के उदाहरण बढ़ते जा रहे हैं।

समस्या का समाधान सिर्फ “नई गाइडलाइन” जारी करने से नहीं होगा।

इसके लिए नीतिगत सुधार और जवाबदेही की ठोस व्यवस्था बनानी होगी।

✅ 1. स्वतंत्र जांच समिति बने

हर जिले में स्वतंत्र निगरानी समिति बनाई जाए, जिसमें प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक प्रतिनिधि और मीडिया सदस्य शामिल हों।

✅ 2. पारदर्शी रिपोर्टिंग प्रणाली

सीएम हेल्पलाइन की जिलेवार रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए — ताकि जनता देख सके कि कितनी शिकायतें दर्ज हुईं, कितनी लंबित हैं और किनका वास्तविक समाधान हुआ।

✅ 3. जवाबदेही तय हो

यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी बिना सत्यापन शिकायत बंद करता है, तो उस पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

✅ 4. फर्जी शिकायतकर्ता और भ्रष्ट कर्मचारी दोनों पर सख्ती

व्यवस्था तभी निष्पक्ष मानी जाएगी जब दोनों पक्षों पर समान रूप से कार्रवाई होगी — जो झूठी शिकायत करे, वह भी दोषी; और जो भ्रष्टाचार करे, वह भी दंडित।

✅ 5. जन-ऑडिट और सामाजिक समीक्षा

प्रत्येक छह माह में जिलेवार जन-सुनवाई रिपोर्ट जारी की जाए और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में समीक्षा हो।

जनता यह नहीं चाहती कि कोई कर्मचारी या अधिकारी अनावश्यक रूप से परेशान हो।

जनता केवल चाहती है कि उसकी आवाज़ शासन तक पहुँचे — ईमानदारी, निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ।

अगर सरकार इस व्यवस्था को फिर से जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाए,
तो “सीएम हेल्पलाइन 181” एक बार फिर “जनता की सच्ची आवाज़” बन सकती है —
ना कि “कमाई का जरिया”।

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