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दमोह: शव वाहन और अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही

यह घटना दमोह, मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर लापरवाही को उजागर करती है।

—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह—

दमोह: शव वाहन और अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही

दमोह जिले में एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जहां एक मृतक के परिजनों को पहले शव वाहन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा, और फिर जिला अस्पताल में भी शव को सम्मानपूर्वक रखने के लिए स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हुई। यह पूरा घटनाक्रम स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

1. शव वाहन के लिए 4-5 घंटे का लंबा इंतजार

* मृतक की पहचान: मृतक की पहचान लखन आदिवासी के रूप में हुई। उनका शव धरमपुरा मुक्तिधाम के पास पड़ा मिला, जिसकी सूचना पुलिस ने परिजनों को दी।

* जिम्मेदारों का रवैया: परिजनों ने तत्काल शव को अस्पताल ले जाने के लिए शव वाहन की व्यवस्था हेतु संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों से संपर्क किया।

* निराशा और पल्ला झाड़ना: परिजनों का गंभीर आरोप है कि जिम्मेदार व्यक्तियों ने मदद करने से साफ मना कर दिया और पल्ला झाड़ते रहे। परिणामस्वरूप, मृतक लखन का शव लगभग चार से पांच घंटे तक घटनास्थल (धरमपुरा मुक्तिधाम के पास) पर ही पड़ा रहा।

* परिजनों की मजबूरी: सरकारी सहायता न मिलने पर, हताश परिजनों को ऑटो रिक्शा किराए पर लेकर शव को जिला अस्पताल दमोह तक लाना पड़ा।

2. जिला अस्पताल में स्ट्रेचर और अटेंडर का अभाव

* अव्यवस्था का आलम: शव को ऑटो से लेकर जिला अस्पताल पहुंचने के बाद भी परिजनों की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। अस्पताल परिसर में:

* कोई अटेंडर (कर्मी) मौजूद नहीं था जो उनकी मदद कर सके।
* शव को रखने या अंदर ले जाने के लिए स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं थी।
* सड़क पर शव: स्ट्रेचर न मिलने के कारण मृतक लखन का शव अस्पताल की मर्चुरी के बाहर सड़क पर ही रखना पड़ा। यह स्थिति स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और मानवीय संवेदनशीलता के अभाव का सबसे बड़ा प्रमाण है।

3. प्रबंधन पर उंगली

* अधिकारी की अनुपलब्धता: परिजनों ने अस्पताल की अव्यवस्था को लेकर जिला अस्पताल के मैनेजर सुरेन्द्र सिंह से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनका मोबाइल फोन नहीं लगा, जिससे उनकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं मिला।

* आए दिन की समस्या: रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि जिला अस्पताल में यह दयनीय हालात आए दिन उत्पन्न होते हैं, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

* झूठी वाहवाही: स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल के मैनेजर अक्सर जिला अस्पताल की झूठी वाहवाही लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है।

यह घटना यह सवाल खड़ा करती है कि जब एक मृतक को सम्मानपूर्वक अंतिम यात्रा के लिए प्राथमिक सहायता नहीं मिल सकती, तो आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

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