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*10वें प्रसव में भी सुरक्षित रही जच्चा-बच्चा*

—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह—

*हाई-रिस्क गर्भावस्था में जीवन की जीत*

*आशा-एएनएम और स्वास्थ्य विभाग के सतर्क प्रयासों से*

*10वें प्रसव में भी सुरक्षित रही जच्चा-बच्चा*

दमोह/हटा।
ग्रामीण भारत में आज भी उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था (High-Risk Pregnancy) मातृ एवं शिशु मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण बनी हुई है। सामाजिक परंपराएँ, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी ऐसे मामलों को और जटिल बना देती हैं। लेकिन दमोह जिले के हटा विकासखंड के ग्राम रनेह से सामने आई यह घटना बताती है कि यदि स्वास्थ्य प्रणाली, फील्ड-स्तरीय कार्यकर्ता और समुदाय एक साथ मिलकर कार्य करें, तो सबसे चुनौतीपूर्ण प्रसव को भी सुरक्षित बनाया जा सकता है।

ग्राम रनेह की 38 वर्षीय आदिवासी महिला कुसुम ने अपने दसवें शिशु को जन्म दिया। यह प्रसव चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत जोखिमपूर्ण था, क्योंकि महिला पहले से ही एनीमिया (गंभीर खून की कमी) से पीड़ित थी और पूर्व में अधिकांश प्रसव घर पर ही हुए थे। इसके बावजूद, स्वास्थ्य विभाग की सतर्क योजना और समय पर हस्तक्षेप के कारण प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सामान्य प्रसव सफलतापूर्वक कराया गया। वर्तमान में माँ और नवजात दोनों पूर्णतः स्वस्थ हैं।

कुसुम का यह दसवाँ गर्भधारण था, जो स्वयं में एक उच्च जोखिम की श्रेणी में आता है। लगातार गर्भधारण, सीमित पोषण, आर्थिक-सामाजिक चुनौतियाँ और नियमित स्वास्थ्य जांच का अभाव महिला की स्थिति को और गंभीर बना रहे थे।

परिवार की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनका सबसे बड़ा पुत्र 17 वर्ष का है, जबकि दो बेटियाँ पहले ही विवाहित हो चुकी हैं। इसके बावजूद परिवार नियोजन के साधनों को पहले नहीं अपनाया गया था, जिससे महिला का स्वास्थ्य लगातार कमजोर होता चला गया।
**एएनएम और आशा बनीं भरोसे की कड़ी**

इस पूरे मामले में ग्राम की एएनएम कुंती चौरसिया और आशा सुपरवाइजर/आशा कार्यकर्ता राजबाई लोधी की भूमिका निर्णायक साबित हुई।

गर्भावस्था के शुरुआती महीनों से ही आशा कार्यकर्ता ने महिला को हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी के रूप में चिन्हित कर नियमित गृह-भ्रमण शुरू किया। प्रत्येक माह महिला की स्वास्थ्य जांच, वजन, रक्तचाप, हीमोग्लोबिन स्तर, टीकाकरण और पोषण संबंधी परामर्श दिया गया।

ग्रामीण परंपराओं और पारिवारिक झिझक के चलते कुसुम शुरू में अस्पताल में प्रसव के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन आशा और एएनएम ने निरंतर समझाइश देते हुए उन्हें यह विश्वास दिलाया कि अस्पताल में प्रसव ही उनके और शिशु दोनों के लिए सुरक्षित है।

जैसे ही प्रसव पीड़ा बढ़ी, महिला को बिना देरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रनेह लाया गया।

यहाँ नर्स देवकी कुर्मी ने महिला की स्थिति को देखते हुए विशेष सतर्कता बरती। एनीमिया और बार-बार प्रसव के इतिहास के बावजूद उन्होंने सभी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप किया, जिससे सामान्य प्रसव सफलतापूर्वक कराया जा सका और किसी भी प्रकार की जटिलता उत्पन्न नहीं हुई।

**महिला की जुबानी जागरूकता ने बदला निर्णय**

प्रसव के बाद कुसुम ने बताया कि यदि आशा कार्यकर्ता और एएनएम बार-बार समझाइश न देतीं, तो वह अस्पताल में आने का साहस नहीं कर पातीं।

उन्होंने कहा कि पहले उन्हें लगता था कि घर पर ही प्रसव सुरक्षित है, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों ने उन्हें संभावित खतरों के बारे में विस्तार सेसमझाया l

सफल और सुरक्षित प्रसव के बाद परिवार ने यह स्वीकार किया कि आगे और गर्भधारण महिला के जीवन के लिए खतरा बन सकता है।
महिला के पति नंदराम आदिवासी (43 वर्ष) ने नसबंदी कराने की सहमति दी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा परिवार नियोजन से संबंधित परामर्श और आवश्यक प्रक्रियाएँ प्रारंभ कर दी गई हैं।

यह निर्णय न केवल महिला के स्वास्थ्य की सुरक्षा करेगा, बल्कि परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी मजबूत बनाएगा।

यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि संस्थागत प्रसव, नियमित जांच, समय पर रेफरल और फील्ड-स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है।

आशा, एएनएम और नर्सिंग स्टाफ की सतर्कता ने यह साबित कर दिया कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ ज़मीनी स्तर पर सही ढंग से लागू हों, तो वे वास्तव में जीवन रक्षक बन सकती हैं।

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1 thought on “*10वें प्रसव में भी सुरक्षित रही जच्चा-बच्चा*”

  1. हरिजन/आदिवासी भी जनसंख्या बढ़ाने में लगे हुए हैं
    हम एक वर्ग विशेष को ही दोषी करार देते हैं

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