—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज दमोह—
*मां के त्याग की अद्भुत मिसाल 75 वर्ष की उम्र में बेटी को दिया नया जीवन*

*कलयुग में भी मां की ममता नहीं पिघली बच्ची को दिया जीवन दान*
दमोह शहर से सामने आई यह प्रेरणादायक कहानी मातृत्व, त्याग और ममता की ऐसी मिसाल है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया है। 75 वर्षीय मनोरमा असाटी ने अपनी गंभीर रूप से बीमार बेटी कंचन असाटी को नया जीवन देने के लिए अपनी किडनी दान कर यह साबित कर दिया कि मां के प्रेम और त्याग की कोई सीमा नहीं होती। सफल किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मां और बेटी दोनों स्वस्थ हैं और सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं।
जानकारी के अनुसार कंचन असाटी पिछले लगभग दस वर्षों से गंभीर किडनी रोग से जूझ रही थीं। उनकी दोनों किडनियां प्रभावित हो चुकी थीं और उन्हें नियमित डायलिसिस कराना पड़ रहा था। लगातार इलाज, शारीरिक कमजोरी और मानसिक तनाव ने पूरे परिवार को कठिन दौर में ला खड़ा किया था। परिवार ने दिल्ली, हरियाणा, इंदौर और हैदराबाद सहित कई शहरों के विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली, लेकिन अंततः चिकित्सकों ने किडनी ट्रांसप्लांट को ही अंतिम विकल्प बताया।
सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त डोनर की थी। काफी प्रयासों के बावजूद सही मैच नहीं मिल पा रहा था। ऐसे कठिन समय में मां मनोरमा असाटी ने अपनी बेटी को जीवनदान देने का निर्णय लिया। डॉक्टरों ने उनकी उम्र को देखते हुए संभावित जोखिमों की जानकारी दी, क्योंकि 75 वर्ष की आयु में किडनी दान करना सामान्य नहीं माना जाता। इसके बावजूद मनोरमा असाटी अपने फैसले पर अडिग रहीं और कहा कि यदि उनकी किडनी से बेटी का जीवन बच सकता है तो वे हर जोखिम उठाने को तैयार हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी और विस्तृत मेडिकल जांच के बाद ट्रांसप्लांट प्रक्रिया पूरी की गई। ऑपरेशन सफल रहा और कंचन असाटी को नया जीवन मिला। वर्तमान में मां और बेटी दोनों स्वस्थ हैं और तेजी से रिकवरी कर रही हैं।
इस संघर्ष के बीच परिवार ने एक और गहरा दुख भी सहा। वर्ष 2024 में कंचन असाटी के पति डॉ. अमित आनंद असाटी का निधन हो गया था। पति के निधन के बाद बीमारी और बच्चों की जिम्मेदारियों ने परिस्थितियों को और कठिन बना दिया। ऐसे समय में मनोरमा असाटी ने न केवल परिवार को संभाला, बल्कि बेटी के इलाज में भी सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
मातृ दिवस के अवसर पर सामने आई यह कहानी आज के समाज के लिए एक गहरी प्रेरणा है। एक ओर जहां कलयुग में कई बार रिश्तों की संवेदनाएं कमजोर पड़ती दिखाई देती हैं, वहीं असाटी परिवार की यह घटना यह संदेश देती है कि मां का हृदय हमेशा अपने बच्चों के लिए समर्पित रहता है। मां अपने बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए हर पीड़ा, संघर्ष और त्याग सहने को तैयार रहती है।
मनोरमा असाटी का यह साहस और ममता न केवल समाज के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह साबित करता है कि सच्चा मातृत्व उम्र का मोहताज नहीं होता।
एमपी अपडेट न्यूज़ टीम के सभी साथी मातृ दिवस की समस्त देशवासियों को बहुत-बहुत बधाई शुभकामनाएं देते हैं












































