—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज दमोह—
*इच्छामृत्यु को लेकर फैली गलतफहमियां और हरीश राणा की कहानी ने फिर याद दिलाया*
*माता-पिता सचमुच भगवान से बढ़कर है आज के युग में बच्चों को सोचना चाहिए*
*मां की आरजू है कि बेटे को मौत आ जाए पर कमबख्त मौत है कि आती नहीं*
भारत की बात एमपी अपडेट के साथ ——

आजकल सोशल मीडिया पर हरीश राणा से जुड़ा एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में जीवन, मृत्यु और माता-पिता के त्याग को लेकर भावुक संदेश दिया जा रहा है। वीडियो देखने के बाद कई लोगों के मन में इच्छामृत्यु को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
दरअसल, बहुत से लोगों के मन में इच्छामृत्यु को लेकर यह गलत धारणा रहती है कि अदालत से अनुमति मिलने के बाद डॉक्टर कोई ऐसी दवा दे देते हैं जिससे तुरंत मृत्यु हो जाए। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।
**क्या होती है इच्छामृत्यु**
कानूनी और चिकित्सकीय दृष्टि से इच्छामृत्यु का मतलब किसी व्यक्ति को जानबूझकर मारने के लिए दवा देना नहीं होता। भारत में सामान्यतः पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति कुछ परिस्थितियों में दी जाती है। इसका अर्थ यह होता है कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से कोमा या ऐसी स्थिति में है जहाँ जीवन केवल मशीनों के सहारे चल रहा है, तो अदालत और परिवार की अनुमति के बाद लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटाया जा सकता है।
यानी यह किसी को मारना नहीं बल्कि कृत्रिम रूप से चल रहे जीवन-सहायक उपकरणों को बंद करने का निर्णय होता है। इसलिए इसे हत्या नहीं माना जाता बल्कि संवेदनशील चिकित्सा और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया फैसला माना जाता है।
**हरीश राणा की कहानी ने झकझोरा**
इसी बीच सोशल मीडिया पर हरीश राणा का एक भावुक वीडियो वायरल हो रहा है। बताया जाता है कि वर्ष 2013 में हरीश राणा एक स्वस्थ और बेहद सुंदर युवा थे, जिनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी। लेकिन अचानक एक हादसे में वह छत से गिर गए।
इस दुर्घटना के बाद उनकी हालत ऐसी हो गई कि वे फिर कभी सामान्य जीवन में लौट नहीं पाए। बीते तेरह वर्षों से उनके माता-पिता लगातार उनकी सेवा कर रहे हैं।
**ब्रह्म कुमारी आश्रम की सिस्टर के द्वारा कहे गए वाक्य**
भाबुक कर देने वाली लाइन सबको माफ करते हुए सभी से माफी मांगते हुए अब जाओ
यह सेवा सिर्फ इलाज या देखभाल भर नहीं होती। इसमें रात-दिन की जागरण, आर्थिक कठिनाइयाँ, मानसिक पीड़ा और अनगिनत त्याग शामिल होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में परिवार क्या-क्या सहता है, यह वही लोग समझ सकते हैं जिनके जीवन में ऐसी परीक्षा आती है।
**माता-पिता का त्याग – सबसे बड़ा धर्म**
हरीश राणा के माता-पिता की सेवा को देखकर लोग भावुक हो रहे हैं। सच भी यही है कि माता-पिता का प्रेम दुनिया का सबसे निस्वार्थ प्रेम होता है।
भगवान भी हर समय हर जगह उपस्थित नहीं हो सकते, इसलिए उन्होंने माँ-बाप को बनाया।
माँ-बाप अपने बच्चों के लिए जो सहते हैं, वह किसी भी देवता के लिए संभव नहीं।
संतान चाहे कैसी भी स्थिति में हो, माता-पिता का हृदय कभी उसका साथ नहीं छोड़ता।
तेरह साल तक एक बीमार बेटे की सेवा करना कोई सामान्य बात नहीं है। इसमें परिवार का समय, सुख-सुविधाएँ, आर्थिक संसाधन और जीवन के अनगिनत अवसर दांव पर लग जाते हैं। फिर भी माता-पिता हार नहीं मानते, क्योंकि उनके लिए उनकी संतान ही उनकी दुनिया होती है।
**हम सभी को जीवन का यह संदेश**
यह घटना हमें एक गहरा संदेश देती है कि जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। कब कौन-सा हादसा हो जाए, कोई नहीं जानता। इसलिए जीवन में जितना संभव हो, लोगों से प्रेम से मिलिए, क्षमा मांगिए और क्षमा कीजिए।
और सबसे महत्वपूर्ण —
माँ-बाप का सम्मान कीजिए क्योंकि मां-बाप जीवन में एक ही बार आते हैं हमारे लिए।
क्योंकि वही लोग हैं जो हमारे गिरने पर हमें संभालते हैं, और अगर हम उठ भी न सकें तो पूरी जिंदगी हमें संभालते रहते हैं।
हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह माता-पिता के अटूट प्रेम, त्याग और धैर्य की मिसाल है।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि किसी भी परिवार को ऐसी कठिन परीक्षा से न गुजरना पड़े। लेकिन अगर कभी ऐसी परिस्थिति आए, तो हर घर में हरीश राणा के माता-पिता जैसा साहस और सेवा का भाव बना रहे।














































