—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह—
*दमोह में विद्या हॉस्पिटल की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल सचिन अग्रवाल की मौत के मामले में जांच पूरी*
*एनेस्थीसिया देने से पहले और बाद में जरूरी चेकअप नहीं होने की बात आई सामने*
*चार सदस्यीय जांच टीम ने रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपी*
दमोह। शहर के स्टेशन रोड स्थित विद्या हॉस्पिटल में 40 वर्षीय सचिन अग्रवाल की मौत का मामला अब धीरे-धीरे गंभीर रूप लेता जा रहा है। मामले की जांच के दौरान अस्पताल की कार्यप्रणाली, मरीज को एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) देने की प्रक्रिया और ऑपरेशन से पहले एवं बाद में किए जाने वाले जरूरी चिकित्सकीय परीक्षणों को लेकर कई सवाल सामने आए हैं। चार सदस्यीय चिकित्सकीय जांच टीम ने मामले की जांच पूरी कर रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की है। अब जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई किए जाने की बात कही जा रही है।
इस मामले में अस्पताल प्रबंधन और संबंधित चिकित्सकों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, किसी की जिम्मेदारी और लापरवाही की अंतिम पुष्टि संबंधित अधिकारियों की जांच तथा उपलब्ध चिकित्सकीय दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही हो सकेगी।
भूख लगने पर मरीज को खाना देने का आरोप, दूसरी बड़ी गलती का दावा
प्रकाशित समाचार के अनुसार, मामले में यह बात भी सामने आई है कि मरीज को एनेस्थीसिया देने के बाद जब उसे भूख लगी, तो डॉ. बुधवानी ने उसे खाना खाने की अनुमति दी। समाचार में इसे एक गंभीर चूक के रूप में उठाया गया है।
चिकित्सकीय दृष्टि से एनेस्थीसिया देने से पहले मरीज के पेट में भोजन होने या खाली होने की स्थिति का आकलन करना महत्वपूर्ण होता है। बेहोशी की दवा के दौरान उल्टी होने और पेट की सामग्री सांस की नली में जाने का खतरा हो सकता है। इस कारण ऑपरेशन से पहले मरीज को भोजन देने संबंधी निर्णय निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल और मरीज की स्थिति के अनुसार लिया जाता है।
ऐसे में जांच का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मरीज को किस परिस्थिति में एनेस्थीसिया दिया गया, भोजन कब दिया गया और उस समय उसकी चिकित्सकीय स्थिति क्या थी। इन तथ्यों की पुष्टि मेडिकल रिकॉर्ड और संबंधित चिकित्सकों के बयानों से होना आवश्यक है।
बेहोश होने के बाद सांस नली में खाना फंसने से मौत की आशंका
समाचार में बताया गया है कि सचिन अग्रवाल की मौत के मामले में आशंका जताई गई कि बेहोशी की स्थिति में सांस की नली में भोजन फंसने के कारण उनकी हालत बिगड़ी हो सकती है। हालांकि, मौत का वास्तविक कारण निर्धारित करने के लिए चिकित्सकीय साक्ष्यों, उपचार के रिकॉर्ड और संबंधित जांच निष्कर्षों का परीक्षण आवश्यक है।
मामले में यह भी सवाल उठाया गया है कि मरीज को एनेस्थीसिया देने से पहले और बाद में आवश्यक जांच की गई थी या नहीं। ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति पर निगरानी, सांस लेने की प्रक्रिया तथा आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं की भूमिका भी जांच के महत्वपूर्ण बिंदु हैं।
चार सदस्यीय डॉक्टरों की टीम ने की जांच
सचिन अग्रवाल की मौत के मामले में जिला स्तर पर चार सदस्यीय चिकित्सकीय टीम गठित कर जांच कराई गई। प्रकाशित समाचार के अनुसार, टीम ने मामले से जुड़े तथ्यों का परीक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की, जिसे कलेक्टर को सौंपे जाने की जानकारी दी गई है।
जांच में यह सवाल भी सामने आया कि विद्या हॉस्पिटल में नर्सिंग स्टाफ की योग्यता और उपलब्धता की स्थिति क्या थी। समाचार में अप्रैल 2026 में हुई एक जांच का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि अस्पताल के रिकॉर्ड में तीन नर्सिंग स्टाफ के योग्य पाए जाने की बात सामने आई थी, जबकि वर्तमान मामले की जांच में नर्सिंग स्टाफ की योग्यता और एनेस्थेटिक से संबंधित व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठे।
इससे अस्पताल के दस्तावेजों, स्टाफ की नियुक्ति, योग्यता और वास्तविक ड्यूटी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच का महत्व बढ़ गया है।
निजी डॉक्टर को बुलाकर की गई थी मौत की पुष्टि
समाचार के अनुसार, सचिन अग्रवाल की मौत के मामले में जांच टीम को यह जानकारी भी मिली कि मरीज की मृत्यु के समय डॉ. बुधवानी ने शहर के एक निजी चिकित्सक डॉ. मनीष पटेल को रात में बुलाया था। बताया गया कि डॉ. मनीष पटेल ने सीपीआर देने के बाद मरीज को मृत घोषित किया था।
इस घटनाक्रम को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं कि मरीज की हालत बिगड़ने के समय अस्पताल में क्या उपचार किया गया, आपातकालीन चिकित्सा की क्या व्यवस्था थी और मरीज को बचाने के लिए कौन-कौन से प्रयास किए गए।
इन सभी बिंदुओं पर स्पष्टता के लिए अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड, सीपीआर से संबंधित विवरण और ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों के बयानों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परिजनों ने न्यायालय में दायर किया परिवाद
सचिन अग्रवाल की मौत के मामले में परिजनों की ओर से न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया गया है। प्रकाशित समाचार के अनुसार, विद्या हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर और डॉ. पीतांबर बुधवानी के खिलाफ न्यायालय में परिवाद दायर किया गया है।
परिवाद में चिकित्सकीय लापरवाही सहित अन्य बिंदुओं की जांच और कार्रवाई की मांग की गई है। न्यायालय ने मामले को संज्ञान में लेते हुए संबंधित जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। समाचार में 10 दिन के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने की मांग का भी उल्लेख है।
यह मामला अब केवल अस्पताल में हुई एक मरीज की मौत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अस्पताल की चिकित्सकीय प्रक्रियाओं, स्टाफ की योग्यता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला रहा है।
अस्पताल के लाइसेंस और नर्सिंग स्टाफ की योग्यता पर भी सवाल
समाचार में अस्पताल के लाइसेंस और नर्सिंग स्टाफ की योग्यता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। बताया गया है कि पूर्व में प्रस्तुत रिपोर्ट और वर्तमान जांच के तथ्यों के बीच स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है।
यदि जांच में अस्पताल संचालन संबंधी नियमों, आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाओं या स्टाफ की योग्यता में अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन और जिम्मेदार पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।
कलेक्टर स्तर पर कार्रवाई की उम्मीद
मामले में जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर ध्यान केंद्रित है। समाचार में डॉ. राकेश राय, सीएमएचओ दमोह के हवाले से बताया गया है कि जांच रिपोर्ट मिल चुकी है और इसे कलेक्टर को सौंपा जाएगा। रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई प्रस्तावित किए जाने की बात कही गई है।
प्रशासनिक कार्रवाई में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि मरीज को एनेस्थीसिया देने से पहले आवश्यक जांच हुई थी या नहीं, ऑपरेशन के दौरान निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया गया या नहीं और मरीज की हालत बिगड़ने पर समय पर उचित उपचार उपलब्ध कराया गया था या नहीं।
मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि, जांच के निष्कर्षों का इंतजार
सचिन अग्रवाल की मौत का मामला निजी अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। अस्पताल में भर्ती होने वाला प्रत्येक मरीज यह अपेक्षा करता है कि उसे निर्धारित मानकों के अनुरूप उपचार मिले और आपातकालीन स्थिति में तत्काल उचित चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो।
अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि चिकित्सकीय लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई किया जाना आवश्यक होगा।















