असरानी ने 20 अक्टूबर 2025 को मुंबई में अंतिम सांस ली।
अंतिम दिनों में वे सांस-सम्बंधी समस्याओं से जूझ रहे थे, और कुछ दिनों तक अस्पताल में भर्ती भी थे। 
उनका जाना न सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे हिंदी सिनेमा जगत के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
गोवर्धन “असरानी” असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान की राजधानी Jaipur में हुआ था।
उन्हें आम-तौर पर केवल “असरानी” नाम से जाना जाता था।
उनका परिवार सिंधी पृष्ठभूमि से था — विभाजन के बाद उनका परिवार जयपुर आकर बस गया था और उनके पिता ने वहाँ कालीन (कारपेट) की दुकान खोली थी।
स्कूली शिक्षा उन्होंने एस्ट् जेवियर्स स्कूल (St. Xavier’s) जयपुर से पूरी की, और राजस्थान कॉलेज, जयपुर से स्नातक की पढ़ाई हुई।
शिक्षा के दौरान उन्होंने जयपुर में All India Radio के लिए वॉइस आर्टिस्ट के रूप में काम किया, ताकि पढ़ाई-लिखाई का खर्च चल सके।
अभिनय की शुरुआत और संघर्ष
असरानी ने 1960-62 के बीच एक्टिंग-प्रशिक्षण लिया था, शिक्षक थे Sahitya Kalbhai Thakkar।
वह 1962 में मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) आए और आगे अध्ययन हेतु 1964 में Film and Television Institute of India (FTII), पुणे में दाखिला लिया।
हिंदी फिल्म जगत में उन्होंने 1967 में Hare Kaanch Ki Choodiyan से शुरुआत की थी – इस फिल्म में उन्होंने बिस्वजीत के दोस्त का रोल निभाया था।
शुरुआती दौर में उन्हें कुछ कठिनाइयाँ आईं; काम मिलना आसान नहीं था।
करियर-उत्थान और प्रसिद्धि
1970 के दशक में असरानी ने अपनी विशिष्ट कॉमिक टाइमिंग और मास-ओडर में ‘मित्र/कॉमेडियन’ भूमिकाओं में अपनी पहचान बनाई। उनके करियर के मुख्य-पल निम्नलिखित हैं:
उनकी सबसे यादगार भूमिका थी Sholay (1975) में “अंग्रेजों के ज़माने के जेलर” का। इस संवाद ने उसे यादगार बना दिया।
उन्होंने लगभग 300–350 से अधिक फिल्मों में काम किया।
उन्होंने हिंदी फिल्मों साथ ही गुजराती फिल्मों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
उनके साथी कलाकारों में प्रमुख थे Rajesh Khanna — उन्होंने लगभग 25 फिल्मों में राजेश खन्ना के साथ काम किया।
उन्होंने निर्देशक के रूप में भी काम किया — जैसे हिंदी फिल्म Chala Murari Hero Banne (1977) और गुजराती फिल्म Amdavad No Rikshavalo (1974) आदि।
शैली, खासियत और योगदान
असरानी की काम में कुछ विशिष्ट बातें हैं:
उनकी कॉमिक टाइमिंग बेहद सटीक थी — आवाज-अंदाज़, हाव-भाव और संवाद प्रस्तुति ने उन्हें अलग बनाया।
उन्होंने न सिर्फ मनोरंजन के लिए काम किया, बल्कि फिल्मों में सलाह-मित्र, भरोसेमंद सहयोगी या हल्के मनोवैज्ञानिक चरित्रों में भी उपस्थिति दी।
उन्होंने लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में उस दौर के ‘कॉमेडियन’ की छवि को बरकरार रखा, जब मुख्य हीरो कम-से-कम एक साथी/कॉमेडियन जरूर लेता था।
बॉलीवुड की ‘सोने की पीढ़ी’ के दौरान उनके काम ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया — जब मुख्यधारा में हल्की-फुल्की कॉमेडी का ट्रेंड था।
चुनिंदा फिल्में
उनकी बहुत-सी यादगार फिल्में हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख:
Sholay (1975) — जेलर की भूमिका
Chupke Chupke — हास्य भूमिका
Bawarchi — “बाबू” का किरदार
Chhoti Si Baat — सहायक भूमिका
समय के अनुसार उन्होंने 2000 के बाद भी फिल्मों में सक्रिय रहे — जैसे Hera Pheri जैसी हास्य-ब्रांड फिल्मों में हल्के रोल में।
व्यक्तिगत जीवन
उन्होंने अभिनेत्री Manju Asrani (पूर्व नाम मंजू बंसल) से विवाह किया था।
उनके जीवन में आधिकारिक रूप से कोई उपस्थिति में बच्चों की जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन सूत्रों में कुछ जानकारी मिली है कि उनकी कोई संतान नहीं थी।
उनका निजी जीवन बहुत से लोग सरल एवं विनम्र बताते हैं — पर्दे पर जितना धमाकेदार, जीवन में उतने ही नम्र।
निधन
असरानी ने 20 अक्टूबर 2025 को मुंबई में अंतिम सांस ली।
अंतिम दिनों में वे सांस-सम्बंधी समस्याओं से जूझ रहे थे, और कुछ दिनों तक अस्पताल में भर्ती भी थे।
उनका जाना न सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे हिंदी सिनेमा जगत के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है।
विरासत
उन्होंने हिंदी-गुजराती फिल्मों में कॉमेडी के स्वरूप को नए आयाम दिए।
उनकी कई लाइनों-डायलॉग्स आज भी याद किए जाते हैं, और फिल्मों में सहायक/कॉमेडियन की भूमिका निभाने वाले कलाकार उनकी शैली से सदैव प्रेरणा लेते हैं।
उनका नाम ‘कॉमिक हल्के-स्वर का भरोसेमंद कलाकार’ के रूप में अमर रहेगा।
आने वाली पीढ़ियों को यह याद रहेगा कि कैसे साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला कलाकार उद्योग में अपनी मेहनत-काबिलियत से लोकप्रिय बना।
असरानी ने अपने जीवन-सफर में यह दिखा दिया कि- ‘कॉमेडी’ सिर्फ हँसी देने का माध्यम नहीं, बल्कि दर्शकों से रिश्ता बनाने का जरिया है।
उनका जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी कला, उनका अंदाज़ और उनकी याद-गारी भूमिकाएँ हमेशा जीवित रहेंगी।















































