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*मां शारदा मंदिर मुकुट चोरी मामला कलेक्टर–एसडीएम की कार्रवाई पर कमिश्नर ने लगाई रोक पुजारी प्रतिनिधि की सेवा बहाल*

—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज दमोह—

*मां शारदा मंदिर मुकुट चोरी मामला कलेक्टर–एसडीएम की कार्रवाई पर कमिश्नर ने लगाई रोक पुजारी प्रतिनिधि की सेवा बहाल*

**सतना से दिनेश शर्मा की रिपोर्ट**

मैहर। मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां शारदा मंदिर मैहर में मुकुट चोरी से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस प्रकरण में पुजारी प्रतिनिधि सुमित पाण्डेय पर लगे आरोपों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर लिए गए निर्णय और बाद में संभागीय कमिश्नर के हस्तक्षेप से नई बहस छिड़ गई है।

जानकारी के अनुसार, देवीधाम समिति के अध्यक्ष जिला कलेक्टर तथा मंदिर के प्रशासक एसडीएम द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में मुकुट चोरी और चढ़ावे में अनियमितता का मामला प्रथम दृष्टया प्रमाणित माना गया था। जांच के आधार पर समिति ने पुजारी प्रतिनिधि सुमित पाण्डेय और गर्भगृह में कार्यरत एक कर्मचारी को सेवा से पृथक करने का आदेश जारी कर दिया था। साथ ही पुजारी प्रतिनिधि के मंदिर परिसर में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

समिति के आदेश में उल्लेख किया गया था कि चढ़ावे के प्रबंधन में गड़बड़ी और नियमों के उल्लंघन के कारण यह कार्रवाई की गई है। प्रशासन का मानना था कि उपलब्ध साक्ष्यों और पूछे गए जवाब के आधार पर यह निर्णय लिया गया।

लेकिन अब इस मामले में नया मोड़ सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, इस आदेश को रीवा संभाग के कमिश्नर द्वारा निरस्त कर दिया गया है। कमिश्नर ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित पुजारी प्रतिनिधि को अपना पक्ष रखने का समुचित अवसर नहीं दिया गया, इसलिए सेवा से पृथक करने का निर्णय उचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर उनकी सेवा बहाल करने के निर्देश दिए गए हैं।

कमिश्नर के इस फैसले के बाद पूरे मामले पर कई सवाल उठने लगे हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि पुजारी प्रतिनिधि कोई विधिक या स्थायी सरकारी पदाधिकारी नहीं होता, इसलिए समिति को विस्तृत सुनवाई की बाध्यता नहीं होती। उनका तर्क है कि समिति द्वारा लिखित साक्ष्यों के आधार पर आरोप लगाए गए थे और संबंधित व्यक्ति से जवाब भी मांगा गया था, लेकिन जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया।

इसी कारण अब यह मामला प्रशासनिक निर्णय और न्यायिक प्रक्रिया के बीच एक नई बहस का विषय बन गया है। स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि इस फैसले ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल यह विवाद अभी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मामले में आगे कानूनी विकल्प अभी खुले हैं और इस निर्णय को उच्च स्तर पर चुनौती भी दी जा सकती है। आने वाले समय में ही स्पष्ट हो सकेगा कि इस पूरे प्रकरण में अंतिम न्याय किसके पक्ष में जाता है।

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