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*घोड़ी की परंपरा पर हमला या सामाजिक बराबरी से असहजता*

संपादकीय कलम से विशेष रिपोर्ट | संदीप शर्मा दमोह ✍️✍️✍️

*घोड़ी की परंपरा पर हमला या सामाजिक बराबरी से असहजता*

*दमोह की घटना ने खड़े किए बड़े सवाल आवारा तत्वों के द्वारा किया गया कृत समाज को बदनाम करने का काम*

दमोह/ हटा थाना क्षेत्र के बिजौरी पाठक गांव में घटी घटना सिर्फ एक शादी समारोह में हुई मारपीट नहीं है बल्कि यह समाज के उस कड़वे सच को सामने लाती है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

एक दलित दिव्यांग दूल्हे द्वारा घोड़ी चढ़ने की परंपरा निभाना कुछ लोगों को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने कानून और इंसानियत दोनों को ताक पर रख दिया।
ऐसे कृत समाज के प्रति एक दूसरे के प्रति घोर नंदा प्रकट करते हैं

मंगलवार की शाम गांव में शादी की खुशियां थीं। 23 वर्षीय दूल्हा, जो दिव्यांग भी है, अपनी बारात के साथ पूरे उत्साह और सम्मान के साथ घोड़ी पर सवार होकर निकला।

यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी—यह आत्मसम्मान, बराबरी और सामाजिक स्वीकार्यता का प्रतीक था।

लेकिन इसी पल ने कुछ लोगों के भीतर छिपे भेदभाव को उजागर कर दिया। आरोप है कि गांव के कुछ दबंगों ने बारात को रोक लिया, दूल्हे को जबरन घोड़ी से नीचे उतारा और उसके साथ मारपीट की।

यह घटना यहीं नहीं रुकी—परिजनों और बारातियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया, जिससे माहौल भय और तनाव में बदल गया।

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए मामला दर्ज किया, आरोपियों पर विभिन्न धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी कार्रवाई शुरू की गई।

पुलिस बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया गया और बाद में सुरक्षा के बीच बारात निकलवाई गई।

कानून डर पैदा कर सकता है, लेकिन समाज में बराबरी और सम्मान की भावना जागृत करना एक लंबी प्रक्रिया है

घोड़ी चढ़ना एक साधारण परंपरा है लेकिन कई जगहों पर यह सामाजिक हैसियत का प्रतीक बना दिया गया है। जब कोई वंचित वर्ग का व्यक्ति इस परंपरा को निभाता है, तो कुछ लोगों को यह अपनी “सत्ता” के खिलाफ लगता है।

यह घटना बताती है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव जिंदा है l और सामाजिक बराबरी को कुछ लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं l परंपराएं, जो खुशी और उत्सव का माध्यम होनी चाहिए, उन्हें अहंकार और वर्चस्व का हथियार बना दिया गया है

यह घटना सिर्फ एक गांव की नहीं है—यह पूरे समाज के लिए एक आईना है। हर व्यक्ति को सम्मान के साथ अपनी परंपराएं निभाने का अधिकार है—चाहे उसकी जाति, वर्ग या शारीरिक स्थिति कुछ भी हो।
हमारी असली प्रगति सड़क, बिजली और विकास योजनाओं से नहीं, बल्कि मानसिकता के बदलाव से होगी।

अगर हम आज भी ऐसी घटनाओं पर चुप रहते हैं, तो हम भी कहीं न कहीं उस अन्याय का हिस्सा बन जाते हैं।

बिजौरी पाठक गांव की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है—
क्या हम सच में 21वीं सदी के आधुनिक समाज में जी रहे हैं, या अब भी पुराने भेदभाव की जंजीरों में जकड़े हुए हैं?

जब तक हर दूल्हा बिना डर के घोड़ी पर नहीं चढ़ सकता,
जब तक हर इंसान बिना भेदभाव के सम्मान नहीं पा सकता,
तब तक हमारी आज़ादी और विकास अधूरा है।

हमें और आपको विचार अवश्य करना होगा

✍️✍️✍️संपादकीय कलम ✍️✍️✍️

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