—प्रधान संपादक पंडित संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह—
*आलोचना हो, लेकिन तथ्यों के साथ… राजनीति हो, लेकिन मर्यादा के साथ*
दमोह के आनंद विभागीय मंत्री लखन पटेल आज सोशल मीडिया पर विरोध करने वालों के लिए शायद एक सॉफ्ट टारगेट बन गए हैं। इसका एक बड़ा कारण उनका सहज, सरल और मिलनसार व्यक्तित्व भी है।
वे लोगों को अपनी बात रखने की आजादी देते हैं और शायद यही सहजता आज सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ होने वाली ट्रोलिंग का कारण बन रही है।
राजनीति में आलोचना होना स्वाभाविक है। जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन हर छोटी-बड़ी समस्या को विवाद बनाकर केवल विधायक और मंत्रियों को जिम्मेदार ठहराना कितना उचित है, इस पर भी विचार होना चाहिए।
आज ऐसा प्रतीत होता है कि विधानसभा क्षेत्र में सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, जनपद अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष, सांसद और स्थानीय प्रशासन जैसे संस्थानों की भूमिका कहीं पीछे छूट गई है और हर समस्या का जिम्मेदार केवल विधायक या मंत्रियों को माना जा रहा है।
गांव में गंदगी है—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
सीसी नाली नहीं है—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
ग्रेवल सड़क नहीं है—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
पानी की स्थानीय समस्या है—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
सड़कों पर पशु बैठे हैं—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
स्कूल भवन जर्जर है—विधायक या मंत्री जिम्मेदार।
जबकि इनमें से कई समस्याएं ग्राम पंचायत, स्थानीय निकाय, संबंधित विभाग और प्रशासन के स्तर पर समाधान योग्य हैं। स्कूल भवन के रखरखाव की जिम्मेदारी भी संबंधित व्यवस्था की होती है। समय-समय पर सामान्य रखरखाव और मरम्मत होती रहे तो भवनों को जर्जर होने से बचाया जा सकता है।
40 वर्षों में दमोह को बदलते हुए देखा है
मैं संदीप शर्मा, 40 वर्ष का हूं। पत्रकार होने के नाते नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में रहने वाले एक सामान्य व्यक्ति के तौर पर अपनी आंखों से बदलाव देख रहा हूं।
आज से कुछ दशक पहले दमोह और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों की स्थिति कैसी थी, यह हमारी पीढ़ी ने देखी है। कई गांवों में बारिश के मौसम में दोपहिया वाहन से पहुंचना भी मुश्किल होता था। जिन रास्तों पर कभी पैदल या दोपहिया वाहन से जाना चुनौती हुआ करता था, आज वहां चार पहिया वाहन पहुंच रहे हैं।
विगत वर्षों पहले हमने आदरणीय प्रेरणा स्रोत दमोह जिले की विश्वसनीय पूर्व विधायक पूर्व वित्त मंत्री और विधायक जयंत मलैया को भी मैंने देखा है उन्होंने कभी अपने स्तर पर दमोह के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि का कार्य किया है
शायद लेख लिखने के पहले मुझे ऐसा लगता है लोग हमें गोदी मीडिया कहेंगे पर मैं उनको बता दूं जो सच है वह सच रहेगा इनके कार्यकाल के दौरान का समय मुझे याद है इनके द्वारा किए गए विकास कार्यों का भी मुझे याद है
इनके कार्यकाल के दौरान जो विकास कार्य किए गए वह आज भी जीवंत उदाहरण है दमोह की जनता के लिए हम सभी के लिए प्रत्यक्ष उदाहरण है…?
हमने वह दौर भी देखा है जब जबलपुर जाने में 6-7 घंटे तक लग जाते थे। बिजली की स्थिति ऐसी थी कि लोग कहते थे—लाइट आती कम और जाती ज्यादा है। यही वजह थी कि घर-घर इन्वर्टर और किसानों के पास जनरेटर जैसी व्यवस्थाएं नहीं होती थी अब संसाधन होने के बाद जरूरी हो गई है शायद
।
पानी के लिए कुएं, नदी और हैंडपंप ही प्रमुख साधन हुआ करते थे। बरसात में मुख्य मार्गों पर घंटों जाम लगना आम बात थी। कई ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और परिवहन की समुचित कनेक्टिविटी तक नहीं थी।
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।
हमारी पीढ़ी ने अपनी आंखों से देखा है कि कैसे सड़क, बिजली, पानी, आवागमन, संचार और आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं में लगातार विस्तार हुआ है।
हमारे दादा-दादी और बुजुर्गों ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाली पीढ़ियां पक्की सड़कों पर चलेंगी, मोबाइल फोन का इस्तेमाल करेंगी, पक्के मकानों में रहेंगी और आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाएंगी। आज वह परिकल्पना काफी हद तक वास्तविकता बन चुकी है।
भविष्य की सोच जरूरी है
आदरणीय लखन भैया के व्यक्तित्व को लेकर मेरी व्यक्तिगत धारणा यही है कि वे केवल आज की समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय को ध्यान में रखकर काम करने की सोच रखते हैं।
पंचमनगर, सीतानगर और जूड़ी जैसी सिंचाई परियोजनाओं को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। विकास के कई कार्य ऐसे होते हैं जिनका पूरा लाभ तत्काल दिखाई नहीं देता, लेकिन आने वाली पीढ़ियां उनका लाभ उठाती हैं।
इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वर्तमान समस्याओं पर सवाल नहीं उठने चाहिए। सड़कें खराब हैं तो बननी चाहिएं। जहां विकास कार्य अधूरे हैं, वहां सवाल होने चाहिए। जहां प्रशासनिक लापरवाही है, वहां जवाबदेही तय होनी चाहिए।
लेकिन सवाल सही व्यक्ति से और सही तथ्य के साथ होना चाहिए।
सोशल मीडिया पर व्यू और लाइक पाने के लिए किसी व्यक्ति के बयान को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करना या लगातार व्यक्तिगत निशाना बनाना न तो पत्रकारिता है और न स्वस्थ लोकतांत्रिक राजनीति।
मेरी नजर में सच्चा जनप्रतिनिधि वही है जो आलोचना को सुने, कमियों को स्वीकार करे और भविष्य को ध्यान में रखकर विकास की दिशा तय करे।
विरोध हो—लेकिन तथ्यों के साथ।
राजनीति हो—लेकिन मर्यादा के साथ।
सवाल हों—लेकिन जिम्मेदारी तय करने से पहले अधिकार क्षेत्र भी देखा जाए।
एक पत्रकार के रूप में मेरी यही अपील है कि हम व्यक्ति नहीं, व्यवस्था और मुद्दों पर बहस करें।
क्योंकि समय बदल रहा है…
और कभी-कभी लगता है—
“देखत-देखत यार बदल गए,
सारे नाते-रिश्तेदार बदल गए,
जिन बातों को कहते थे सच्ची,
अब तो वे अखबार बदल गए…”
जय हिंद 🇮🇳 जय भारत 🇮🇳 पत्रकारिता लेख निष्पक्ष संदीप शर्मा एमपी अपडेट न्यूज़ दमोह कलम ही मेरी ताकत है
















